Digital Arrest के नाम पर डराने वाले ठगों पर लखनऊ पुलिस का Digital Kavach, अब साइबर अपराधियों पर कड़ी कार्रवाई होगी ओर तेज।
डिजिटल अरेस्ट के खिलाफ लखनऊ पुलिस का ‘डिजिटल कवच’: डर दिखाकर ठगी करने वालों पर अब तेज कार्रवाई….
लखनऊ। साइबर ठगों द्वारा पुलिस, CBI, ED, TRAI या दूसरी सरकारी एजेंसियों के अधिकारी बनकर लोगों को डराने और पैसे ऐंठने की घटनाओं के बीच लखनऊ पुलिस ने ‘ऑपरेशन डिजिटल कवच’ शुरू किया है। इसका उद्देश्य केवल ठगों को पकड़ना नहीं, बल्कि शिकायत मिलते ही पैसे को रोकना, तकनीकी सबूत जुटाना, ठगी की रकम वापस दिलाने की कोशिश करना और लोगों को इस अपराध के तरीके के बारे में जागरूक करना है।
क्या है ‘ऑपरेशन डिजिटल कवच’?
लखनऊ पुलिस कमिश्नरेट की क्राइम ब्रांच इस अभियान के तहत डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों पर एक समन्वित तरीके से काम करेगी। पुलिस मोबाइल और तकनीकी डेटा, बैंक ट्रांजैक्शन, मनी ट्रेल और दूसरे डिजिटल सबूतों का विश्लेषण कर आरोपियों और उनके नेटवर्क तक पहुंचने की कोशिश करेगी।
सबसे महत्वपूर्ण पहलू है तुरंत वित्तीय हस्तक्षेप। शिकायत मिलते ही पुलिस बैंक और वित्तीय संस्थानों के साथ समन्वय करके संदिग्ध रकम को hold या lien कराने का प्रयास करेगी, ताकि ठग पैसा आगे ट्रांसफर या निकाल न सकें।
लखनऊ पुलिस के मुताबिक 1 से 20 अगस्त 2026 के बीच साइबर सेल ने अलग-अलग साइबर अपराध शिकायतों में ₹2,40,56,807 की रकम को hold/lien कराने में सफलता हासिल की। इसी अवधि में करीब ₹16.97 लाख पीड़ितों को वापस दिलाए गए। साइबर पुलिस स्टेशन के स्तर पर अलग से करीब ₹24 लाख की वापसी भी कराई गई।
डिजिटल अरेस्ट का असली खेल क्या है?
‘डिजिटल अरेस्ट’ कोई वास्तविक कानूनी प्रक्रिया नहीं है। ठग इसका इस्तेमाल लोगों के मन में डर पैदा करने के लिए करते हैं।
आमतौर पर ठग फोन या वीडियो कॉल पर खुद को पुलिस, CBI, ED, TRAI, RBI या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताते हैं। फिर वे दावा करते हैं कि व्यक्ति का मोबाइल नंबर, बैंक खाता, पार्सल या पहचान किसी गंभीर अपराध से जुड़ी है।
इसके बाद शुरू होता है psychological pressure—यानी मानसिक दबाव।
पीड़ित से कहा जा सकता है कि उसके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट है, मनी लॉन्ड्रिंग की जांच चल रही है या उसका नाम किसी आपराधिक मामले में आया है। कई मामलों में वीडियो कॉल पर लगातार जुड़े रहने, किसी से बात न करने और पैसे ट्रांसफर करने का दबाव बनाया जाता है।
केंद्र सरकार भी पहले स्पष्ट कर चुकी है कि ऐसे मामलों में अपराधी सरकारी अधिकारियों की पहचान का इस्तेमाल कर लोगों को धमकाते हैं और वीडियो कॉल के जरिए कथित ‘डिजिटल अरेस्ट’ करते हैं। सरकार ने इसे संगठित ऑनलाइन आर्थिक अपराध से जुड़ी समस्या बताया है।
लखनऊ में ही सामने आ चुके हैं गंभीर मामले
यह अभियान ऐसे समय शुरू हुआ है जब लखनऊ में डिजिटल अरेस्ट के कई गंभीर मामले सामने आए हैं।
हाल ही में एक 70 वर्षीय रिटायर्ड FCI कर्मचारी और उनकी पत्नी को कथित तौर पर करीब 19 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट के नाम पर डराया गया और उनसे लगभग ₹42 लाख की ठगी हुई। जांच में पुलिस को छह मोबाइल नंबर और छह बैंक खातों का पता चला तथा ठगी की रकम का डिजिटल ट्रेल भारत से बाहर कंबोडिया, UAE और चीन तक जाने के संकेत मिले। पुलिस ने करीब ₹13.83 लाख पर रोक लगाने में सफलता हासिल की।
एक अन्य मामले में लखनऊ पुलिस ने ऐसे आरोपियों को पकड़ा था जिन्होंने खुद को UP ATS अधिकारी बताकर एक दंपति से करीब ₹90 लाख की ठगी की थी। जांच में बैंक खातों, डिजिटल फॉरेंसिक और कथित क्रिप्टो ट्रेल का भी इस्तेमाल किया गया।
इन घटनाओं से साफ है कि यह केवल फोन पर होने वाली सामान्य ठगी नहीं है। इसके पीछे फर्जी पहचान, बैंक खाते, मनी म्यूल, डिजिटल कम्युनिकेशन और कई राज्यों या देशों में फैले नेटवर्क का इस्तेमाल हो सकता है।
‘डिजिटल कवच’ क्यों महत्वपूर्ण है?
इस अभियान की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पुलिस का फोकस केवल ‘ठग को पकड़ने’ तक सीमित नहीं है।
इसमें चार स्तर दिखाई देते हैं—
- Detection: शिकायत और तकनीकी संकेतों से अपराध की पहचान।
- Financial Intervention: बैंकिंग सिस्टम के जरिए रकम को जल्द रोकने की कोशिश।
- Investigation & Arrest: डिजिटल और वित्तीय सबूतों से नेटवर्क तक पहुंचना।
- Awareness: लोगों को यह समझाना कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ नाम की कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है।
यही मॉडल साइबर फ्रॉड से लड़ाई में ज्यादा प्रभावी हो सकता है, क्योंकि ठगी के बाद समय सबसे महत्वपूर्ण होता है। जितनी जल्दी शिकायत होगी, उतनी जल्दी बैंकिंग चैनल में रकम रोकने की संभावना बनती है।
केंद्र सरकार के अनुसार, I4C के तहत चल रहे Citizen Financial Cyber Fraud Reporting and Management System (CFCFRMS) के जरिए 30 जून 2026 तक ₹11,158 करोड़ से अधिक की राशि बचाई जा चुकी थी, जो 32.80 लाख से अधिक शिकायतों से जुड़ी थी।
एक और अहम बदलाव: नोटिस की जांच भी संभव
डिजिटल अरेस्ट के बढ़ते मामलों के बीच केंद्र स्तर पर भी तकनीकी समाधान विकसित किए जा रहे हैं। मई 2026 में CBI ने ‘ABHAY’ AI-based notice verification system शुरू किया, जिसका उद्देश्य CBI के नाम से आने वाले संदिग्ध नोटिसों की वास्तविकता जांचने में नागरिकों की मदद करना है।
इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—आज साइबर ठगी सिर्फ नकली लिंक या OTP तक सीमित नहीं है। अपराधी फर्जी सरकारी नोटिस, लोगो, पहचान पत्र, वीडियो कॉल और AI/deepfake जैसी तकनीकों से विश्वसनीयता बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
आम आदमी को क्या करना चाहिए?
अगर कोई व्यक्ति फोन या वीडियो कॉल पर खुद को पुलिस, CBI, ED या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर गिरफ्तारी की धमकी देता है, तो:
1. तुरंत कॉल काटें।
वीडियो कॉल पर जुड़े रहने की जरूरत नहीं है।
2. पैसे ट्रांसफर न करें।
‘केस बंद करने’, ‘जमानत’, ‘वेरिफिकेशन’ या ‘खाता सुरक्षित करने’ के नाम पर पैसा मांगना बड़ा खतरे का संकेत है।
3. OTP, PIN, पासवर्ड और बैंक जानकारी न दें।
4. खुद आधिकारिक नंबर से सत्यापन करें।
कॉलर द्वारा दिए गए नंबर पर भरोसा न करें।
5. पैसा चला गया है तो तुरंत 1930 पर कॉल करें।
राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 और National Cyber Crime Reporting Portal तत्काल रिपोर्टिंग के लिए उपलब्ध हैं।
असली ‘कवच’ तकनीक से ज्यादा जागरूकता है
‘डिजिटल कवच’ की सफलता केवल गिरफ्तारियों की संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए। इसका वास्तविक प्रभाव इस बात से तय होगा कि शिकायत से लेकर बैंक में रकम रोकने तक पुलिस कितनी तेजी से प्रतिक्रिया देती है, अलग-अलग राज्यों की पुलिस और बैंकिंग संस्थाओं के बीच सूचना कितनी तेजी से साझा होती है और पीड़ितों को रकम वापस कराने की प्रक्रिया कितनी प्रभावी बनती है।
डिजिटल अरेस्ट स्कैम की सबसे खतरनाक ताकत तकनीक नहीं, बल्कि डर और अधिकार का झूठा प्रदर्शन है। ठग जानते हैं कि आम व्यक्ति पुलिस, CBI या ED के नाम से घबरा सकता है। इसलिए वे पहले मानसिक नियंत्रण हासिल करते हैं और उसके बाद आर्थिक ठगी करते हैं।
लखनऊ पुलिस का ‘डिजिटल कवच’ इस मॉडल को उलटने की कोशिश है—डर के बजाय सत्यापन, देरी के बजाय तत्काल रिपोर्टिंग और केवल गिरफ्तारी के बजाय पैसे की recovery पर भी फोकस।
सबसे जरूरी बात
भारत में ‘डिजिटल अरेस्ट’ नाम की कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है। कोई सरकारी एजेंसी वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी करके पैसे ट्रांसफर करने का आदेश नहीं देती। ऐसी स्थिति में घबराएं नहीं, कॉल काटें, स्वतंत्र रूप से सत्यापन करें और तुरंत 1930 पर रिपोर्ट करें। केंद्र सरकार भी नागरिकों को इसी तरह सतर्क रहने की सलाह देती रही है।
स्रोत: लखनऊ साइबर फ्रॉड रिपोर्ट और भारत सरकार के गृह मंत्रालय/PIB के आधिकारिक साइबर अपराध संबंधी अपडेट।
