कोलकाता में SIM के नाम पर बड़ा खेल, फर्जी कनेक्शनों से जुड़ा ₹1.1 करोड़ का संदिग्ध साइबर फ्रॉड नेटवर्क जांच के घेरे में।
कोलकाता में ₹1.1 करोड़ का SIM फ्रॉड: ग्राहकों के दस्तावेज और बायोमेट्रिक से ‘Ghost SIM’ बनाने का आरोप…..
कोलकाता: शहर में साइबर ठगी का एक ऐसा नेटवर्क सामने आया है, जिसमें कथित तौर पर लोगों के पहचान दस्तावेज, निजी डेटा और बायोमेट्रिक जानकारी का दुरुपयोग कर उनके नाम पर अतिरिक्त मोबाइल SIM जारी किए गए। कोलकाता पुलिस की Cyber Cell इस मामले की जांच कर रही है। पुलिस के अनुसार, करीब दो महीनों में इस नेटवर्क से जुड़े दो अलग-अलग मॉड्यूल के जरिए ₹1.094 करोड़ के संदिग्ध वित्तीय लेनदेन का पता चला है।
मामला क्या है?
पुलिस की शुरुआती जांच के मुताबिक, कुछ Point of Sale (PoS) टेलीकॉम विक्रेताओं, डिस्ट्रीब्यूटर्स और स्टोर कर्मचारियों ने कथित रूप से ग्राहकों की KYC प्रक्रिया के दौरान उपलब्ध कराए गए संवेदनशील डेटा का गलत इस्तेमाल किया।
आरोप है कि वास्तविक ग्राहक की पहचान का इस्तेमाल करके उसके नाम पर कई SIM कार्ड सक्रिय किए गए। इन अनधिकृत कनेक्शनों को बाद में साइबर अपराधियों तक पहुंचाया गया, जिन्होंने इनका इस्तेमाल वित्तीय धोखाधड़ी के लिए किया।
पुलिस के अनुसार, 21 अगस्त या उससे पहले तक चल रहे इस नेटवर्क से जुड़े दो ऑपरेशनल मॉड्यूल में क्रमशः ₹83.1 लाख और ₹26.3 लाख के संदिग्ध लेनदेन सामने आए।
‘Ghost SIM’ आखिर क्या होता है?
Ghost SIM का मतलब ऐसे मोबाइल कनेक्शन से है जो किसी वास्तविक व्यक्ति की पहचान या दस्तावेजों के आधार पर जारी तो हुआ हो, लेकिन उस व्यक्ति की जानकारी या अनुमति के बिना किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा हो।
ऐसे SIM साइबर अपराधियों के लिए बेहद उपयोगी हो सकते हैं, क्योंकि इनके जरिए वे कॉल, मैसेज, मैसेजिंग ऐप और कभी-कभी बैंकिंग या अन्य डिजिटल सेवाओं से जुड़े काम कर सकते हैं, जबकि रिकॉर्ड में नंबर किसी दूसरे व्यक्ति के नाम पर दिखाई देता है।
भारत में पहले भी अलग-अलग मामलों में ऐसे फर्जी या अनधिकृत SIM नेटवर्क सामने आ चुके हैं। 2025 में असम पुलिस ने असम, राजस्थान और तेलंगाना से जुड़े एक कथित Ghost SIM नेटवर्क पर कार्रवाई की थी, जिसमें अनधिकृत SIM के साइबर अपराध और संवेदनशील जानकारी के संभावित दुरुपयोग से संबंध की जांच की गई थी।
इस मामले में सबसे बड़ा खतरा क्या है?
यह मामला सिर्फ SIM की चोरी या फर्जीवाड़े तक सीमित नहीं है। इसका असली खतरा Identity Misuse है।
अगर किसी व्यक्ति के नाम पर उसकी जानकारी के बिना SIM जारी हो जाता है, तो अपराधी उस नंबर का इस्तेमाल करके:
- फर्जी बैंकिंग या UPI गतिविधियां कर सकते हैं।
- सोशल मीडिया या मैसेजिंग अकाउंट बनाने/चलाने की कोशिश कर सकते हैं।
- दूसरे साइबर अपराधों में मोबाइल नंबर का इस्तेमाल कर सकते हैं।
- पुलिस जांच के दौरान असली दस्तावेज धारक को शुरुआती स्तर पर संदेह के दायरे में ला सकते हैं।
- OTP आधारित सेवाओं को निशाना बनाने की कोशिश कर सकते हैं।
इसलिए SIM अब केवल कॉल करने का साधन नहीं है; यह व्यक्ति की डिजिटल पहचान से जुड़ा महत्वपूर्ण सुरक्षा माध्यम बन चुका है।
KYC सिस्टम में अंदरूनी व्यक्ति सबसे कमजोर कड़ी?
इस केस की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पुलिस का आरोप केवल बाहरी साइबर अपराधियों पर नहीं है। जांच में PoS एजेंटों और टेलीकॉम से जुड़े कर्मचारियों की कथित भूमिका भी सामने आई है।
यही कारण है कि इस तरह के मामलों में केवल ग्राहक को सावधान रहने की सलाह देना पर्याप्त नहीं है। Telecom KYC ecosystem में डेटा तक पहुंच रखने वाले कर्मचारियों, दुकानों और एजेंटों की निगरानी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
भारत के दूरसंचार नियमों में SIM जारी करने के लिए KYC और पहचान सत्यापन की प्रक्रियाएं निर्धारित हैं। DoT के मौजूदा नियमों में biometric-based identification और e-KYC/D-KYC प्रक्रियाओं पर जोर दिया गया है।
DoT के निर्देशों में SIM activation प्रक्रिया में ग्राहक की पहचान और captured information की जांच जैसे सुरक्षा उपाय भी निर्धारित किए गए हैं।
आपके नाम पर कितने SIM चल रहे हैं, ऐसे जांचें
अगर आपको संदेह है कि आपके नाम पर कोई अनजान मोबाइल नंबर जारी हुआ है, तो सरकार के Sanchar Saathi प्लेटफॉर्म की TAFCOP सुविधा उपयोगी है।
TAFCOP के जरिए मोबाइल नंबर डालकर आपके नाम पर जारी मोबाइल कनेक्शनों की जानकारी देखी जा सकती है। संदिग्ध या अनजान कनेक्शन मिलने पर उसे रिपोर्ट करने और आवश्यक कार्रवाई की सुविधा भी उपलब्ध है।
क्या करें:
- अपने नाम पर जारी सभी मोबाइल कनेक्शन जांचें।
- कोई अनजान नंबर दिखाई दे तो उसे तुरंत रिपोर्ट करें।
- अपने आधार/KYC दस्तावेजों की अनावश्यक कॉपी किसी को न दें।
- SIM खरीदते समय केवल अधिकृत टेलीकॉम चैनल का इस्तेमाल करें।
- अचानक नेटवर्क बंद होने या SIM से जुड़ी असामान्य गतिविधि को नजरअंदाज न करें।
- बैंक और UPI खातों में भी संदिग्ध गतिविधि की जांच करें।
₹1.1 करोड़ से बड़ा है असली सवाल
इस मामले में सामने आया करीब ₹1.1 करोड़ का नुकसान महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि अपराधियों को लोगों की पहचान संबंधी जानकारी और biometric/KYC डेटा तक कथित रूप से पहुंच कैसे मिली।
अगर जांच में यह साबित होता है कि अंदरूनी नेटवर्क ने ग्राहक डेटा का इस्तेमाल करके बड़े पैमाने पर SIM जारी किए, तो यह Cyber Fraud + Identity Theft + Telecom KYC Abuse का संयुक्त मॉडल होगा।
इस मॉडल में अपराधी को हर बार किसी नए व्यक्ति को फोन करके विश्वास में लेने की जरूरत नहीं पड़ती। पहले किसी दूसरे व्यक्ति की पहचान का इस्तेमाल करके मोबाइल कनेक्शन तैयार किया जा सकता है और फिर उस कनेक्शन को दूसरे साइबर अपराधों में इस्तेमाल किया जा सकता है।
यही वजह है कि SIM fraud को केवल telecom fraud समझना गलती होगी। यह digital identity infrastructure की सुरक्षा से जुड़ा मामला है।
सरकार पहले ही ऐसे अनधिकृत कनेक्शनों की पहचान के लिए TAFCOP जैसे सिस्टम विकसित कर चुकी है। DoT ने बताया था कि Sanchar Saathi के माध्यम से लाखों संदिग्ध मोबाइल कनेक्शनों की पहचान और डिस्कनेक्शन की कार्रवाई की गई है।
आगे पुलिस की जांच में क्या अहम होगा?
अब जांचकर्ताओं के लिए कुछ महत्वपूर्ण कड़ियां सामने आ सकती हैं:
पहला, कथित तौर पर कितने SIM जारी किए गए?
दूसरा, किन ग्राहकों के दस्तावेज और biometric information का इस्तेमाल हुआ?
तीसरा, ये SIM किन साइबर अपराधियों को दिए गए?
चौथा, इन नंबरों से किन बैंक खातों, UPI IDs, wallets या डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल हुआ?
पांचवां, PoS स्तर पर डेटा किस तरीके से हासिल और इस्तेमाल किया गया?
इन सवालों के जवाब मिलने पर यह स्पष्ट होगा कि मामला कुछ स्थानीय ऑपरेटरों तक सीमित था या इसके पीछे बड़ा inter-state cybercrime network मौजूद है।
निष्कर्ष
कोलकाता का यह मामला एक महत्वपूर्ण चेतावनी है—आपके नाम पर चल रहा अनजान SIM सिर्फ एक अतिरिक्त मोबाइल नंबर नहीं हो सकता; वह किसी साइबर अपराधी की डिजिटल पहचान बन सकता है।
इसलिए समय-समय पर अपने नाम पर जारी मोबाइल कनेक्शनों की जांच करना उतना ही जरूरी है जितना बैंक खाते और क्रेडिट रिपोर्ट की निगरानी करना।
स्रोत: भारत सरकार के Department of Telecommunications/Sanchar Saathi के आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर लेखन व विश्लेषण।
