गरीबों और छात्रों के खाते बने साइबर ठगों की कमाई का नया हथियार!
राजस्थान में 82 हजार से ज्यादा ‘म्यूल अकाउंट’, साइबर ठगों का नया जाल गरीबों और छात्रों तक पहुंचा….
जयपुर: राजस्थान में साइबर अपराध की एक ऐसी कड़ी सामने आ रही है, जो सिर्फ ठगों तक सीमित नहीं है। बैंक खाते किराये पर लेकर या लालच देकर हासिल करना और फिर उन्हें ठगी की रकम घुमाने के लिए इस्तेमाल करना साइबर अपराधियों का बड़ा हथियार बन गया है। राजस्थान पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, 1 जनवरी से 12 जुलाई 2026 के बीच राज्य में 82,407 ‘म्यूल अकाउंट’ की पहचान हुई। इसी अवधि में पुलिस ने 723 मामले दर्ज किए, 657 लोगों को गिरफ्तार किया और 11,633 खातों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की।
‘म्यूल अकाउंट’ आखिर होता क्या है?
म्यूल अकाउंट वह बैंक खाता होता है जिसका इस्तेमाल किसी दूसरे व्यक्ति या साइबर गिरोह की अवैध रकम को प्राप्त करने, आगे भेजने या निकालने के लिए किया जाता है। कई बार खाताधारक को पता ही नहीं होता कि उसके खाते में आने वाला पैसा साइबर ठगी से जुड़ा है। लेकिन कुछ मामलों में लोग कमीशन या एकमुश्त रकम के बदले जानबूझकर अपना खाता उपलब्ध कराते हैं।
यही वजह है कि साइबर पुलिस के सामने असली ठग तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। ठगी की रकम पहले एक खाते में आती है, फिर कई दूसरे खातों में भेजी जाती है और अंत में नकद निकासी, क्रिप्टोकरेंसी या दूसरे माध्यमों के जरिए पैसा नेटवर्क से बाहर कर दिया जाता है।
गरीब मजदूर और कॉलेज छात्र क्यों बन रहे हैं निशाना?
राजस्थान के डूंगरपुर में सामने आया मामला इस नेटवर्क की गंभीरता दिखाता है। पुलिस के मुताबिक, करीब 450 म्यूल अकाउंट वाले नेटवर्क का पता चला, जिसमें लगभग ₹160 करोड़ की संदिग्ध साइबर फ्रॉड ट्रांजैक्शन की जांच की गई।
पुलिस जांच में आरोप है कि गरीब मजदूरों और कॉलेज छात्रों को सरकारी योजना, मुफ्त PAN कार्ड, स्कॉलरशिप या लोन दिलाने के नाम पर बैंक खाते खुलवाने के लिए तैयार किया गया। इसके बाद कथित तौर पर उनसे पासबुक, चेकबुक, डेबिट कार्ड और इंटरनेट बैंकिंग की जानकारी तक ले ली गई।
इन खातों की जानकारी कथित रूप से दुबई और कुवैत में मौजूद साइबर अपराध ऑपरेटरों तक पहुंचाई गई। इन खातों का इस्तेमाल स्टॉक मार्केट, क्रिप्टोकरेंसी और बेटिंग से जुड़ी ऑनलाइन ठगी की रकम लेने के लिए किया गया। जांच में Telegram के जरिए नेटवर्क के संचालन की बात भी सामने आई है।
₹8-10 हजार में बैंक अकाउंट ‘लीज’ पर!
बाड़मेर में भी पुलिस ने म्यूल अकाउंट से जुड़े 2026 में 10 FIR दर्ज होने की जानकारी दी है। पुलिस के अनुसार कुछ लोग अपने बैंक खाते और दस्तावेज ₹8,000 से ₹10,000 तक के बदले एजेंटों को दे रहे थे।
एजेंट कथित तौर पर उदयपुर, जयपुर और दूसरे राज्यों से लोगों तक पहुंचते थे। कुछ खाताधारकों को बाद में अपने दस्तावेज वापस मिले, जबकि कुछ मामलों में दस्तावेज वापस नहीं मिले।
यानी साइबर अपराधियों को हर बार खुद बैंक खाता खोलने की जरूरत नहीं पड़ती। वे आर्थिक रूप से कमजोर या आसानी से प्रभावित लोगों के मौजूदा बैंकिंग सिस्टम का इस्तेमाल कर लेते हैं।
असली ठग तक पहुंचना इतना मुश्किल क्यों?
मान लीजिए किसी व्यक्ति से ₹5 लाख की ऑनलाइन ठगी हुई। पैसा सीधे ठग के खाते में जाने के बजाय पहले एक म्यूल अकाउंट में आया। वहां से वह दो-तीन और खातों में गया और फिर ATM, चेक, क्रिप्टो या अन्य माध्यम से निकाल लिया गया।
ऐसे में जांचकर्ता को सिर्फ ठग का मोबाइल नंबर नहीं, बल्कि पूरा money trail खोजना पड़ता है।
यही साइबर अपराध की सबसे बड़ी चुनौती है—पहला बैंक अकाउंट हमेशा मास्टरमाइंड का नहीं होता। वह नेटवर्क की सिर्फ एक कड़ी हो सकता है।
कानून क्या कहता है?
राजस्थान पुलिस के अनुसार, ऐसे मामलों में आरोपियों पर Information Technology Act की धारा 66D तथा भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 61(2), 318(4) और 319(2) के तहत कार्रवाई की जा सकती है। यानी यह सोच लेना कि “मैंने तो सिर्फ अपना अकाउंट दिया था” कानूनी जिम्मेदारी से बचने की गारंटी नहीं है।
हालांकि, हर खाताधारक को एक ही नजर से देखना भी सही नहीं होगा। पुलिस के सामने चुनौती यह तय करना है कि कौन व्यक्ति धोखे का शिकार था और किसने जानबूझकर अपराधियों को बैंकिंग सुविधा उपलब्ध कराई।
राजस्थान से आगे भी बड़ा खतरा
यह समस्या केवल राजस्थान तक सीमित नहीं है। गृह मंत्रालय के अनुसार, 30 जून 2026 तक I4C के Suspect Registry में बैंकों से 30.48 लाख से अधिक संदिग्ध पहचान संबंधी डेटा प्राप्त हुआ और 32.08 लाख Layer-1 mule accounts की जानकारी भागीदार संस्थाओं के साथ साझा की गई। इन सूचनाओं के आधार पर ₹25,698 करोड़ की संदिग्ध/फ्रॉड ट्रांजैक्शन को decline किया गया।
I4C और Reserve Bank Innovation Hub ने 2026 में AI आधारित mule-account detection को मजबूत करने के लिए साझेदारी भी की है। इसके तहत Suspect Registry के डेटा का इस्तेमाल MuleHunter.ai जैसी तकनीक के जरिए संदिग्ध वित्तीय गतिविधियों की शुरुआती पहचान में किया जा रहा है।
सबसे बड़ा खतरा: ‘थोड़े पैसे’ का लालच
इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि साइबर अपराधी हमेशा तकनीकी कमजोरी नहीं खोजते। वे कई बार आर्थिक मजबूरी और आसान कमाई की इच्छा को निशाना बनाते हैं।
₹5,000, ₹8,000 या ₹10,000 के लालच में दिया गया बैंक अकाउंट आगे चलकर लाखों-करोड़ों रुपये की ठगी के money trail का हिस्सा बन सकता है। खाताधारक को मिलने वाला कमीशन छोटा हो सकता है, लेकिन कानूनी और वित्तीय जोखिम बहुत बड़ा हो सकता है।
दूसरी तरफ, डूंगरपुर जैसे मामलों से यह भी पता चलता है कि साइबर अपराध अब सिर्फ बड़े शहरों की समस्या नहीं है। छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के बैंक खाते भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय साइबर नेटवर्क में इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
आम आदमी क्या करे?
- अपना बैंक अकाउंट, ATM कार्ड, चेकबुक, UPI PIN या इंटरनेट बैंकिंग लॉगिन किसी दूसरे व्यक्ति को न दें।
- “अकाउंट इस्तेमाल करने दो, हर महीने पैसे मिलेंगे” जैसे ऑफर से दूर रहें।
- किसी अनजान एजेंट के कहने पर सरकारी योजना, लोन या स्कॉलरशिप के नाम पर खाता न खुलवाएं।
- अगर किसी ने आपके खाते का गलत इस्तेमाल किया है, तो बैंक और पुलिस को तुरंत सूचना दें।
- साइबर फ्रॉड होने पर तुरंत 1930 पर शिकायत करें और National Cyber Crime Reporting Portal पर रिपोर्ट दर्ज करें।
- I4C के Suspect Repository में मोबाइल नंबर, ईमेल, बैंक अकाउंट या UPI ID जैसे identifiers की जांच भी की जा सकती है; हालांकि I4C खुद स्पष्ट करता है कि यह डेटाबेस शिकायतों पर आधारित है और किसी identifier की आपराधिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है।
निष्कर्ष
82,407 म्यूल अकाउंट की पहचान सिर्फ एक पुलिस आंकड़ा नहीं, बल्कि साइबर अपराध के बदलते मॉडल का संकेत है। अब अपराधी केवल फर्जी लिंक, कॉल या ऐप के जरिए लोगों को नहीं ठग रहे; वे बैंकिंग सिस्टम के भीतर मौजूद सामान्य खातों को भी अपराध की पाइपलाइन में बदल रहे हैं।
इसलिए साइबर सुरक्षा का अगला मोर्चा सिर्फ “ठग को पकड़ना” नहीं, बल्कि ठगी की रकम जिस वित्तीय नेटवर्क से गुजरती है, उस पूरे नेटवर्क को समय रहते पहचानना और रोकना है। राजस्थान का मामला इसी बड़ी चुनौती की गंभीर तस्वीर पेश करता है।
