डिजिटल अरेस्ट का खौफ दिखाकर साइबर ठगों ने बुजुर्ग की जिंदगीभर की बचत निशाना बनाई।
PFI का नाम लेकर 67 साल के बुजुर्ग को ‘डिजिटल अरेस्ट’, ₹4 लाख की ठगी…..
साइबर ठग अब लोगों को डराने के लिए सिर्फ पुलिस या CBI का नाम नहीं लेते, बल्कि आतंकवाद, मनी लॉन्ड्रिंग और प्रतिबंधित संगठनों से जोड़कर मानसिक दबाव बनाने लगे हैं। हैदराबाद में ऐसा ही एक मामला सामने आया, जहां 67 साल के एक रिटायर्ड इंश्योरेंस कर्मचारी को कथित तौर पर PFI से जोड़ने का डर दिखाकर ‘डिजिटल अरेस्ट’ किया गया और उनसे ₹4 लाख ट्रांसफर करा लिए गए।
ऐसे शुरू हुआ पूरा फर्जीवाड़ा
पीड़ित के पास एक व्यक्ति का फोन आया। उसने खुद को Data Protection Board of India का प्रतिनिधि बताया। फोन करने वाले ने दावा किया कि पीड़ित के नाम पर जारी एक SIM कार्ड का इस्तेमाल आपराधिक गतिविधियों में हुआ है।
बुजुर्ग ने जब कहा कि वह SIM उनका नहीं है, तो कॉल को कथित तौर पर एक दूसरे व्यक्ति के पास ट्रांसफर कर दिया गया। दूसरे व्यक्ति ने खुद को मुंबई पुलिस अधिकारी बताया।
इसके बाद ठगों ने कहानी को और गंभीर बना दिया। पीड़ित से कहा गया कि वह मनी लॉन्ड्रिंग और अन्य अपराधों की जांच में फंस गए हैं और उन्हें ‘डिजिटल अरेस्ट’ में रखा गया है।
PFI का नाम लेकर बढ़ाया डर
ठगों ने दावा किया कि प्रतिबंधित संगठन Popular Front of India (PFI) के शीर्ष पदाधिकारियों के खिलाफ हुई तलाशी के दौरान पीड़ित का ATM कार्ड मिला है।
पीड़ित ने PFI से किसी भी तरह का संबंध होने से इनकार किया। इसके बाद उसे वीडियो कॉल पर एक ऐसे व्यक्ति से बात कराई गई, जिसे IPS अधिकारी बताया गया।
यही इस ठगी का सबसे खतरनाक हिस्सा था—ठगों ने एक के बाद एक पुलिस, जांच एजेंसी, PFI और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके पीड़ित के मन में यह विश्वास पैदा किया कि मामला बेहद गंभीर है।
₹4.85 लाख की जानकारी ली, फिर ₹4 लाख ट्रांसफर कराए
पीड़ित के मुताबिक, वीडियो कॉल के दौरान उससे उसकी व्यक्तिगत और बैंकिंग जानकारी पूछी गई।
जब उसने बताया कि उसके खाते में करीब ₹4.85 लाख हैं, तो ठगों ने कथित तौर पर उससे कहा कि ₹85,000 वह अपनी मेडिकल जरूरतों के लिए रख सकता है और बाकी ₹4 लाख RTGS के जरिए एक बैंक खाते में ‘वेरिफिकेशन’ के नाम पर भेज दे।
पीड़ित ने ₹4 लाख ट्रांसफर कर दिए। बाद में उसे समझ आया कि वह साइबर ठगी का शिकार हो चुका है।
सबसे जरूरी बात: ‘डिजिटल अरेस्ट’ नाम की कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ‘डिजिटल अरेस्ट’ असल में साइबर ठगों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला डराने का तरीका है।
ठग वीडियो कॉल पर पुलिस अधिकारी, CBI अधिकारी, कोर्ट अधिकारी या अन्य सरकारी अधिकारी बनकर सामने आते हैं। फिर पीड़ित को बताया जाता है कि उसके खिलाफ FIR, मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग्स, SIM कार्ड या बैंक खाते से जुड़ा कोई गंभीर मामला है।
इसके बाद उसे कहा जाता है कि:
- किसी को फोन मत करो।
- घर से बाहर मत निकलो।
- वीडियो कॉल मत काटो।
- बैंक खाते की जानकारी दो।
- पैसे ‘वेरिफिकेशन’ के लिए भेजो।
हकीकत में कोई पुलिस अधिकारी वीडियो कॉल के जरिए किसी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं करता और न ही जांच के नाम पर बैंक खाते में पैसे ट्रांसफर करवाता है।
हैदराबाद में यह अकेला मामला नहीं
यह घटना किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। जुलाई 2026 में हैदराबाद में दो बुजुर्ग अलग-अलग डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड में कुल ₹9 लाख से ज्यादा गंवा चुके हैं। एक मामले में 72 वर्षीय व्यक्ति से ₹5 लाख और दूसरे मामले में 73 वर्षीय रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी से ₹4 लाख ट्रांसफर कराए गए थे। दोनों मामलों में ठगों ने खुद को सरकारी या जांच एजेंसी के अधिकारी बताया था।
इससे पहले हैदराबाद में 73 वर्षीय रिटायर्ड एयरफोर्स कर्मचारी से ₹33.5 लाख की ठगी का मामला भी सामने आया था। उसमें भी ठगों ने Aadhaar से जुड़े मोबाइल नंबर और फर्जी FIR का डर दिखाकर पीड़ित को फंसाया था।
जनवरी 2026 में एक और बेहद बड़ा मामला सामने आया था, जिसमें 81 वर्षीय हैदराबाद निवासी को फर्जी ड्रग्स केस में फंसाने की धमकी देकर ₹7.12 करोड़ ट्रांसफर करा लिए गए थे।
ठगी का असली हथियार पैसा नहीं, डर है
इस तरह के मामलों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—साइबर ठग पहले बैंक खाता नहीं देखते, वे इंसान का डर पकड़ते हैं।
उनका तरीका आम तौर पर इस तरह काम करता है:
पहला चरण: SIM, Aadhaar, बैंक या पार्सल से जुड़ी छोटी समस्या बताना।
दूसरा चरण: कॉल को कथित पुलिस/CBI अधिकारी के पास ट्रांसफर करना।
तीसरा चरण: FIR, मनी लॉन्ड्रिंग या गंभीर अपराध का डर पैदा करना।
चौथा चरण: वीडियो कॉल और नकली दस्तावेजों से कहानी को असली जैसा बनाना।
पांचवां चरण: पीड़ित को परिवार और बैंक से दूर रखना।
छठा चरण: ‘वेरिफिकेशन’ या ‘केस क्लियरेंस’ के नाम पर पैसा ट्रांसफर कराना।
यानी Scam का केंद्र तकनीक से ज्यादा Psychological Pressure है।
PFI का नाम सुनकर घबराने की जरूरत क्यों नहीं?
इस मामले में ठगों ने PFI का नाम इस्तेमाल किया। लेकिन किसी व्यक्ति को किसी संगठन से जोड़ने का दावा सिर्फ फोन पर कोई अधिकारी कर दे, इससे वह आरोप वास्तविक नहीं हो जाता।
PFI को केंद्र सरकार ने 28 सितंबर 2022 को UAPA के तहत पांच साल के लिए प्रतिबंधित किया था।
इसलिए यदि कोई फोन करके कहे कि आपका नाम किसी प्रतिबंधित संगठन, आतंकी गतिविधि या मनी लॉन्ड्रिंग जांच में आया है, तो घबराकर पैसा भेजना समाधान नहीं है। आधिकारिक एजेंसी से स्वतंत्र रूप से संपर्क करके सत्यापन करना जरूरी है।
आम लोगों के लिए 7 गोल्डन रूल
1. फोन पर ‘डिजिटल अरेस्ट’ की बात सुनते ही सतर्क हो जाएं।
2. पुलिस, CBI, ED, कोर्ट या किसी सरकारी अधिकारी के नाम पर पैसा मांगा जाए तो भुगतान न करें।
3. बैंक खाते में पैसे ‘वेरिफिकेशन’ के लिए भेजने की बात हो तो इसे बड़ा Red Flag मानें।
4. वीडियो कॉल पर दिखाए गए ID कार्ड, FIR या कोर्ट ऑर्डर को अकेले देखकर भरोसा न करें।
5. कॉल काटकर संबंधित विभाग का नंबर खुद आधिकारिक स्रोत से खोजें और संपर्क करें।
6. परिवार के किसी सदस्य या भरोसेमंद व्यक्ति को तुरंत बताएं। ठग अक्सर पीड़ित को दूसरों से बात करने से रोकते हैं।
7. अगर पैसे चले गए हैं तो तुरंत बैंक और साइबर अपराध अधिकारियों को सूचना दें।
निष्कर्ष
हैदराबाद का यह मामला दिखाता है कि साइबर ठगी अब सिर्फ OTP या लिंक तक सीमित नहीं रही। अपराधी कानून, जांच एजेंसियों और प्रतिबंधित संगठनों के नाम का इस्तेमाल करके लोगों पर ऐसा मानसिक दबाव बनाते हैं कि पीड़ित खुद अपने पैसे ट्रांसफर कर देता है।
इसलिए याद रखें:
कोई असली पुलिस अधिकारी आपको वीडियो कॉल पर ‘डिजिटल अरेस्ट’ करके पैसे वेरिफिकेशन के लिए ट्रांसफर करने को नहीं कहता।
डरिए नहीं, कॉल काटिए और स्वतंत्र रूप से सत्यापन कीजिए। यही ऐसे फ्रॉड के खिलाफ सबसे पहला सुरक्षा कवच है।
