पूर्व जज को CBI का डर दिखाकर साइबर ठगों ने ₹2.5 करोड़ उड़ाए!!!!
जयपुर में 90 साल के पूर्व जज से ₹2.5 करोड़ की ठगी: 15 दिन तक ‘डिजिटल अरेस्ट’ का डर दिखाकर बनाया शिकार…..
जयपुर में साइबर ठगी का एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। 90 वर्षीय सेवानिवृत्त जिला जज गणपत सिंह भंडारी को कथित तौर पर फर्जी CBI और RBI अधिकारियों ने करीब 15 दिनों तक ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर डराया और उनसे ₹2.50 करोड़ से अधिक रकम ट्रांसफर करा ली। पुलिस के मुताबिक मामला तब सामने आया, जब SBI के एक मैनेजर ने उनके PPF खाते से और पैसे ट्रांसफर करने की कोशिश रोक दी।
कैसे शुरू हुआ पूरा खेल?
पुलिस में दर्ज शिकायत के अनुसार, 28 जुलाई 2026 को गणपत सिंह भंडारी के पास एक अनजान नंबर से WhatsApp वीडियो कॉल आई। कॉल करने वाला पुलिस की वर्दी में था और उसने खुद को मुंबई का CBI अधिकारी बताया।
उसने दावा किया कि मुंबई में ₹50 करोड़ के कथित हवाला लेनदेन की जांच चल रही है और उसमें से ₹40 लाख भंडारी के SBI खाते में आए हैं। इसके बाद उन्हें गिरफ्तारी की धमकी दी गई और कहा गया कि वे इस बारे में परिवार के किसी सदस्य को न बताएं।
इसके बाद एक दूसरे व्यक्ति ने WhatsApp पर संपर्क किया और खुद को RBI मैनेजर बताया। उसने दावा किया कि हवाला से जुड़ी रकम म्यूचुअल फंड में निवेश की गई है। इसके नाम पर उसने भंडारी से उनके Mutual Funds, निवेश और वित्तीय दस्तावेजों की जानकारी मांगी।
डर और लगातार दबाव के बीच भंडारी ने कथित तौर पर ये जानकारी साझा कर दी।
‘जांच में सहयोग’ के नाम पर खाते खाली कराए
इसके बाद ठगों ने नया जाल बिछाया। उन्होंने कहा कि जांच में सहयोग और रकम के सत्यापन के लिए अलग-अलग बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर करने होंगे।
शिकायत के मुताबिक, 3 से 10 अगस्त के बीच भंडारी ने अपने SBI खाते से कुल ₹2,50,51,000 ट्रांसफर किए। India Today के अनुसार, इन ट्रांजैक्शनों में ₹22.17 लाख और ₹28.34 लाख जैसी रकम के ट्रांसफर भी शामिल थे; इसके बाद ₹40-₹40 लाख के कई ट्रांसफर और ₹30-₹30 लाख के ट्रांसफर किए गए।
सबसे खतरनाक बात यह थी कि ठग केवल पैसे नहीं मांग रहे थे, बल्कि पीड़ित को मानसिक रूप से नियंत्रित कर रहे थे।
उन्होंने कथित तौर पर हर बातचीत के बाद WhatsApp चैट, कॉल लॉग और दूसरे मैसेज डिलीट करने को कहा। इससे परिवार को घटना की जानकारी नहीं मिल पाई।
बैंक मैनेजर ने बचाए करीब ₹1.5 करोड़
ठगों की नजर इसके बाद भंडारी के PPF खाते पर गई। उन्होंने उनसे वहां से भी रकम ट्रांसफर करने को कहा।
जब भंडारी SBI की जौहरी बाजार शाखा पहुंचे, तो बैंक मैनेजर को बड़े ट्रांजैक्शन पर शक हुआ। बातचीत के दौरान मैनेजर को समझ आया कि मामला सामान्य वित्तीय लेनदेन का नहीं है।
मैनेजर ने ट्रांसफर रोक दिया। सूत्रो के मुताबिक, इससे खाते में बची करीब ₹1.50 करोड़ की रकम और जाने से बच गई। इसके बाद भंडारी ने अपने भतीजे से संपर्क किया और पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
पुलिस ने Bharatiya Nyaya Sanhita (BNS) और Information Technology Act की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। आरोपियों और जिन बैंक खातों में रकम भेजी गई, उनकी जांच की जा रही है।
सबसे बड़ा सवाल: 90 साल के पूर्व जज भी कैसे फंस गए?
यह घटना बताती है कि डिजिटल अरेस्ट स्कैम केवल कम पढ़े-लिखे या तकनीक से अनजान लोगों तक सीमित नहीं है।
ठग तीन स्तरों पर हमला करते हैं:
1. Authority का डर:
CBI, पुलिस, RBI या अदालत का नाम लेकर पीड़ित को विश्वास दिलाया जाता है कि मामला वास्तविक है।
2. Fear + Urgency:
“अभी गिरफ्तारी होगी”, “खाता जब्त होगा”, “परिवार को मत बताना”—ऐसी बातें व्यक्ति को सोचने का समय नहीं देतीं।
3. Isolation:
पीड़ित को परिवार से बात करने से रोका जाता है और वीडियो कॉल पर लगातार निगरानी जैसा माहौल बनाया जाता है।
यानी यह सिर्फ financial fraud नहीं, बल्कि psychological manipulation है।
‘डिजिटल अरेस्ट’ असल में क्या है?
सबसे जरूरी तथ्य यह है कि भारत के कानून में WhatsApp या वीडियो कॉल के जरिए किसी व्यक्ति को ‘डिजिटल अरेस्ट’ करने की कोई वैध पुलिस प्रक्रिया नहीं है।
अगर कोई व्यक्ति खुद को CBI, पुलिस, RBI या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर कहता है कि आप वीडियो कॉल पर “गिरफ्तार” हैं और गिरफ्तारी से बचने के लिए पैसे ट्रांसफर करें, तो इसे साइबर ठगी का बड़ा संकेत मानना चाहिए।
NHRC की जून 2026 की चर्चा में भी अधिकारियों और विशेषज्ञों ने बताया कि डिजिटल अरेस्ट स्कैम में खास तौर पर वरिष्ठ नागरिकों और सेवानिवृत्त पेशेवरों को निशाना बनाया जा रहा है। NHRC के अनुसार, I4C के National Cyber Crime Reporting Portal से संकलित आंकड़ों के आधार पर पिछले छह वर्षों में भारत में cyber-enabled fraud से लगभग ₹52,976 करोड़ के नुकसान की बात सामने रखी गई थी, जिसमें करीब 8% नुकसान डिजिटल अरेस्ट स्कैम से जुड़ा बताया गया।
NHRC चर्चा में यह भी सामने आया कि ठगी के नेटवर्क में mule bank accounts, telecom infrastructure, leaked personal data और अंतरराष्ट्रीय cybercrime networks महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। CBI की ओर से भी Southeast Asia स्थित cyber-scam compounds और mule-account networks से जुड़े खतरों का उल्लेख किया गया।
इस केस से आम लोगों को क्या सीखना चाहिए?
याद रखें—सरकारी अधिकारी वीडियो कॉल पर डराकर आपसे ‘जांच’ के नाम पर पैसे ट्रांसफर नहीं कराते।
अगर कोई ऐसा कॉल आए तो:
- तुरंत कॉल काटें।
- CBI, RBI, पुलिस या अदालत के नाम से आए दावे को खुद आधिकारिक माध्यम से verify करें।
- OTP, PIN, password, CVV या banking details साझा न करें।
- किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर money transfer न करें।
- परिवार के सदस्य या भरोसेमंद व्यक्ति को तुरंत बताएं।
- WhatsApp चैट या कॉल रिकॉर्ड डिलीट न करें—ये जांच में सबूत बन सकते हैं।
- अगर पैसे चले गए हैं तो तुरंत 1930 पर साइबर फ्रॉड की शिकायत करें और National Cyber Crime Reporting Portal पर रिपोर्ट दर्ज करें। सरकारी पोर्टल cybercrime की ऑनलाइन शिकायत दर्ज करने की सुविधा देता है।
एक लाइन में पूरी कहानी
ठगों ने पहले कानून का डर पैदा किया, फिर जांच का बहाना बनाया, उसके बाद बैंकिंग जानकारी हासिल की और अंत में करोड़ों रुपये ट्रांसफर करा लिए।
जयपुर की यह घटना इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यहां एक पूर्व जिला जज को निशाना बनाया गया। इससे स्पष्ट है कि डिजिटल अरेस्ट गैंग की असली ताकत तकनीक से ज्यादा डर, भरोसे और मानसिक दबाव का इस्तेमाल है।
सावधानी का सबसे बड़ा नियम:
कोई भी असली अधिकारी आपको वीडियो कॉल पर डराकर पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।
