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“गोल्ड कंपनी या अकाउंटिंग मिस्ट्री”? राजेश एक्सपोर्ट्स पर बड़ा खुलासा!

aajtaksafe@gmail.com June 11, 2026
ChatGPT Image Jun 11, 2026, 10_01_33 PM
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 “₹15.15 लाख करोड़ का सवाल: राजेश एक्सपोर्ट्स पर SEBI के आरोप, सच क्या है और निवेशकों को क्यों चिंतित होना चाहिए?”

राजेश एक्सपोर्ट्स पर SEBI का बड़ा शिकंजा: ₹15.15 लाख करोड़ की कथित वित्तीय गड़बड़ी का मामला क्या है?

राजेश एक्सपोर्ट्स मामला: क्या है पूरा विवाद?

राजेश एक्सपोर्ट्स भारत की एक बहुत बड़ी गोल्ड (सोना) कंपनी है। सोना रिफाइनिंग और ज्वेलरी निर्यात कंपनी Rajesh Exports इन दिनों देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट विवादों में से एक का सामना कर रही है। भारतीय शेयर बाजार के नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने इस कंपनी और इसके चेयरमैन Rajesh Mehta के खिलाफ अंतरिम कार्रवाई करते हुए गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं। SEBI का दावा है कि वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच कंपनी ने लगभग ₹15.15 लाख करोड़ के राजस्व (Revenue) को गलत तरीके से प्रस्तुत किया, जिससे निवेशकों के सामने कंपनी की वास्तविक वित्तीय स्थिति से अलग तस्वीर पेश हुई।

आसान भाषा में समझिए पूरा मामला

मान लीजिए कोई व्यक्ति अपनी आय ₹10 लाख बताता है जबकि वास्तव में उसकी आय ₹1 लाख है। निवेशक, बैंक और बाजार उस व्यक्ति को ज्यादा सक्षम और भरोसेमंद समझेंगे।

SEBI का आरोप है कि राजेश एक्सपोर्ट्स ने भी कुछ ऐसा ही किया। कंपनी ने अपने विदेशी सहयोगी संस्थानों (Subsidiaries) के जरिए दिखाए गए राजस्व को वास्तविक रिकॉर्ड से कहीं अधिक बताया। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास के सबसे बड़े कथित राजस्व-हेरफेर मामलों में से एक हो सकता है।

जांच की शुरुआत कैसे हुई?

मार्च 2024 में एक शेयरधारक ने SEBI को शिकायत दी। शिकायत में कहा गया कि कंपनी की बड़ी मात्रा में व्यापारिक देनदारियां (Trade Receivables) कई वर्षों से वसूली के बिना पड़ी हुई हैं।

इस शिकायत के बाद:

  • SEBI ने जांच शुरू की।
  • फॉरेंसिक ऑडिट कराया गया।
  • कंपनी के दस्तावेजों और खातों की जांच की गई।
  • विदेशी इकाइयों के वित्तीय रिकॉर्ड का सत्यापन किया गया।

स्विट्जरलैंड की कंपनी Valcambi SA क्यों बनी विवाद का केंद्र?

SEBI के अनुसार, राजेश एक्सपोर्ट्स की कुल आय का 97% से 99% हिस्सा विदेशी इकाइयों से आने का दावा किया गया।

सबसे महत्वपूर्ण इकाई थी:

Valcambi SA

यह दुनिया की प्रमुख गोल्ड रिफाइनरियों में से एक मानी जाती है।

लेकिन जांच में पाया गया कि:

  • समूह स्तर (Consolidated Accounts) पर बहुत बड़ा राजस्व दिखाया गया।
  • जबकि Valcambi के स्वतंत्र ऑडिट किए गए खातों में इतनी बड़ी आय दिखाई नहीं दी।
  • SEBI का कहना है कि दोनों आंकड़ों में भारी अंतर था।

₹15.15 लाख करोड़ का आंकड़ा आखिर है क्या?

यह रकम कथित “चोरी” या “नकद घोटाला” नहीं है।

यह वह राजस्व (Revenue) है जिसे SEBI के अनुसार पर्याप्त दस्तावेजों और लेनदेन रिकॉर्ड से सत्यापित नहीं किया जा सका।

यानी:

आरोप राजस्व की गलत प्रस्तुति (Revenue Misrepresentation) का है, नकदी गायब होने का नहीं।

यह अंतर समझना बेहद महत्वपूर्ण है।

SEBI ने और कौन-कौन सी अनियमितताएं बताईं?

1. संदिग्ध बिक्री और खरीद लेनदेन

SEBI ने कहा कि कुछ वर्षों में कंपनी की बिक्री और खरीद का बड़ा हिस्सा एक ब्रोकर कंपनी के साथ दिखाया गया।

लेकिन संबंधित पक्ष ने ऐसे लेनदेन से इनकार किया।

इससे सवाल उठे कि क्या ये लेनदेन वास्तव में हुए भी थे या नहीं।

2. अफ्रीका की सोने की खदानों में निवेश

कंपनी ने लगभग ₹1,035 करोड़ के निवेश का दावा किया था।

SEBI का कहना है कि:

  • निवेश संबंधी पर्याप्त दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए।
  • खदानों के मूल्यांकन और अस्तित्व को लेकर स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले।

3. प्रमोटर से जुड़े खातों में फंड ट्रांसफर

SEBI ने आरोप लगाया कि कंपनी का पैसा प्रमोटर से जुड़े खातों और संस्थाओं के माध्यम से स्थानांतरित किया गया।

जांच में लगभग ₹926 करोड़ के लेनदेन पर सवाल उठाए गए हैं।

नियामक का कहना है कि इनमें से कुछ लेनदेन का पर्याप्त खुलासा नहीं किया गया था।

4.रिसीवेबल्स (उधार पैसा) की गड़बड़ी: व्यापार में ‘रिसीवेबल्स’ का मतलब वह पैसा है जो ग्राहकों ने अभी दिया नहीं है, लेकिन भविष्य में देंगे।

  • सेबी ने पाया कि कंपनी के पास बहुत बड़ी मात्रा में ऐसा पैसा बकाया था जो ग्राहकों ने सालों से नहीं चुकाया था।
  • कंपनी ने ₹2914 करोड़ की राशि को बिना किसी ठोस एग्रीमेंट या सपोर्टिंग डॉक्यूमेंट के “एडजस्ट” करने की कोशिश की, जिससे शक और गहरा गया।

    5.रिलेटेड पार्टी ट्रांजैक्शन (RPT):

    आरोप है कि कंपनी ने अपने प्रमोटरों और परिवार द्वारा नियंत्रित अन्य फर्मों के बीच पैसों का लेन-देन किया। इसे ‘मनी डायवर्जन’ कहा जाता है, जहाँ कंपनी के फंड को पारदर्शी तरीके से इस्तेमाल करने के बजाय गुप्त रूप से घुमाया जाता है।

SEBI ने क्या कार्रवाई की?

SEBI ने अंतरिम आदेश में:

  • फॉरेंसिक ऑडिट (Forensic Audit): अब कंपनी के खातों की बारीकी से जांच होगी जिसे फॉरेंसिक ऑडिट कहते हैं, ताकि यह पता चल सके कि पैसा वास्तव में कहाँ गया।

जांच के तीन मुख्य बिंदु: सेबी यह देखेगा कि क्या यहाँ डायवर्जन (पैसा कहीं और इस्तेमाल करना), राउटिंग (अलग-अलग खातों में पैसा घुमाना) या लेयरिंग (काले धन को सफेद बनाने की कोशिश) हुई है।

  • राजेश मेहता को कंपनी के शेयरों में खरीद-बिक्री से रोका।
  • कंपनी को सभी दस्तावेज प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
  • आगे की जांच पूरी होने तक निगरानी बढ़ा दी।

कंपनी का पक्ष क्या है?

राजेश एक्सपोर्ट्स और राजेश मेहता ने सभी आरोपों को खारिज किया है।

उनका कहना है:

  • कंपनी के राजस्व आंकड़े सही हैं।
  • SEBI ने Consolidated Revenue को सही तरीके से नहीं समझा।
  • Valcambi द्वारा बड़े पैमाने पर सोने की रिफाइनिंग की जाती है, इसलिए बड़ा राजस्व स्वाभाविक है।
  • यह केवल एक अंतरिम आदेश है, अंतिम निर्णय नहीं।

आम जनता और निवेशकों पर प्रभाव

  • शेयरों में गिरावट: जैसे ही ये खबरें आईं, कंपनी के शेयर एक ही दिन में 5% तक गिर गए। इससे उन आम लोगों का पैसा डूब गया जिन्होंने इस कंपनी के शेयर खरीदे थे।
  • LIC का निवेश: इस कंपनी में सरकारी संस्था LIC ने भी भारी निवेश किया था। सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या LIC जैसी संस्था ने निवेश से पहले कंपनी के खातों की ठीक से जांच नहीं की थी?।

प्रमोटरों पर प्रतिबंध: सेबी ने कंपनी के प्रमोटरों और सीईओ (जैसे राजेश मेहता) को शेयर बाजार में ट्रेडिंग करने से फिलहाल रोक दिया है।

निवेशकों के लिए इसका क्या मतलब है?

यह मामला तीन बड़े सवाल खड़े करता है:

1. ऑडिट सिस्टम कितना मजबूत है?

यदि इतने बड़े अंतर वर्षों तक सामने नहीं आए, तो ऑडिट प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर सवाल उठते हैं।

2. विदेशी सहायक कंपनियों की निगरानी कैसे हो?

बहुराष्ट्रीय संरचना वाली कंपनियों में विदेशी इकाइयों के खातों की स्वतंत्र जांच जरूरी हो सकती है।

3. छोटे निवेशकों की सुरक्षा कैसे बढ़े?

निवेशक अक्सर प्रकाशित वित्तीय रिपोर्टों पर भरोसा करते हैं। यदि वे गलत हों तो निवेशकों को बड़ा नुकसान हो सकता है।

नीति स्तर पर क्या सुधार होने चाहिए?

तत्काल कदम

✅ विदेशी सहायक कंपनियों का अनिवार्य विस्तृत खुलासा

✅ बड़े समूहों के लिए वार्षिक फॉरेंसिक ऑडिट

✅ संबंधित पक्ष (Related Party) लेनदेन की रियल-टाइम रिपोर्टिंग

✅ ऑडिटरों की जवाबदेही बढ़ाना

✅ SEBI को विदेशी रिकॉर्ड तक तेज पहुंच देने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग

निष्कर्ष: राजेश एक्सपोर्ट्स का यह मामला कॉर्पोरेट गवर्नेंस (कंपनी चलाने के नियमों) की विफलता का एक बड़ा उदाहरण है। फिलहाल ये आरोप सेबी के अंतरिम आदेश पर आधारित हैं और अंतिम फैसला विस्तृत जांच के बाद ही आएगा। आम निवेशकों को सलाह दी जाती है कि वे ऐसी कंपनियों के ‘कंसोलिडेटेड‘ नंबरों और ऑडिट रिपोर्ट पर बारीकी से नजर रखें

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