“छोटी कंपनी, बड़ा निवेश, बड़ी बातें—क्या ये डिजिटल इंडिया का भविष्य है या जनता के पैसे से खेला गया खतरनाक खेल???”
उत्तर प्रदेश सरकार और ‘पूछ AI’ (Puch AI) के बीच हुए ₹25,000 करोड़ के समझौते (MoU) को कई कारणों से एक संभावित घोटाले और धोखाधड़ी के रूप में वर्णित किया गया है:
इस समझौते को संदिग्ध मानने का सबसे बड़ा कारण कंपनी की क्षमता और समझौते की राशि के बीच का विशाल अंतर है। जहाँ एक ओर MoU ₹25,000 करोड़ का है, वहीं स्रोतों के अनुसार ‘पूछ AI’ का वर्ष 2025 में राजस्व मात्र ₹50 लाख था। विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं कि इतने कम राजस्व वाली कंपनी इतने बड़े परिमाण की परियोजना को कैसे पूरा करेगी।
1.समझौते (MoU) का विवरण और उद्देश्य
- समझौता: उत्तर प्रदेश सरकार ने ‘न्यू उत्तर प्रदेश’ अभियान के तहत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की शक्ति को अपनाने के लिए एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) साइन किया है।
- एमओयू (MOU) का मूल्य: पुछ एआई ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के साथ ₹25,000 करोड़ का एमओयू साइन किया है, जिसका उद्देश्य एआई पार्क और डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना है।
- उत्पाद का स्वरूप: यह मुख्य रूप से एक WhatsApp चैटबॉट होने का दावा करता है। इनके पास कोई अपनी ऐप या वेबसाइट नहीं है।
- प्रस्तावित परियोजनाएं: इस निवेश के माध्यम से राज्य में AI पार्क, डेटा सेंटर और एक AI यूनिवर्सिटी बनाने की योजना है।
2.वित्तीय डेटा और विसंगतियां
वित्तीय और व्यापारिक दावे
- राजस्व और मूल्यांकन पर संदेह: कंपनी के वार्षिक राजस्व (Revenue) और मूल्यांकन (Valuation) को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। स्रोत के अनुसार, कंपनी के पास इतने बड़े निवेश के वादों को पूरा करने के लिए कोई ठोस वित्तीय आधार या पिछला रिकॉर्ड नहीं है।
- स्थापना: यह कंपनी जून 2025 में स्थापित की गई थी, और मात्र 9 महीनों के भीतर इसने हजारों करोड़ों के एमओयू करने का दावा किया है।
- राजस्व (Revenue): स्रोतों के अनुसार, ‘पूछ AI’ का वर्ष 2025 में राजस्व मात्र ₹50 लाख था।
- मुख्य चिंता: विश्लेषण में यह सवाल उठाया गया है कि ₹50 लाख के राजस्व वाली कंपनी ₹25,000 करोड़ के इतने बड़े प्रोजेक्ट को कैसे क्रियान्वित करेगी।
3.तकनीकी विश्लेषण: ‘रैपर’ और चैटबॉट तकनीक
स्रोतों का दावा है कि ‘पूछ AI’ कोई वास्तविक AI आविष्कारक नहीं है, बल्कि एक “रैपर” (Wrapper) है।
- बुनियादी ढांचा: यह दावा किया गया है कि ‘पूछ AI’ कोई मौलिक तकनीक नहीं है, बल्कि एक “रैपर” (Wrapper) है। इसका मतलब है कि उनके पास खुद का कोई बेस मॉडल नहीं है; वे केवल ऊपर से एक इंटरफेस प्रदान कर रहे हैं।
- गूगल जेम्मा (Google Gemma) का उपयोग: कंपनी के पास अपनी कोई अंतर्निहित AI तकनीक नहीं है; यह गूगल के ‘जेम्मा’ (Gemma) मॉडल का उपयोग करती है, जो सभी के लिए मुफ्त उपलब्ध है।
- अनुकूलन की कमी: यह भी आरोप है कि कंपनी ने इस मॉडल को अपने विशिष्ट उद्देश्यों के लिए ‘फाइन-ट्यून’ तक नहीं किया है।
- साधारण इंटरफेस: इसका उत्पाद केवल एक WhatsApp चैटबॉट की तरह काम करता है, जो ऐसे उत्तर देता है जो कोई भी ChatGPT, Gemini या Grok से मुफ्त में प्राप्त कर सकता है।
4.पिछले उदाहरण और विफलताएं
- अयोध्या वैदिक सिटी मामला: 2023 में ‘अरहास टेक्नोलॉजी’ (Arahas Technologies) के साथ अयोध्या को पहली AI-पावर्ड वैदिक सिटी बनाने के लिए एक MoU साइन किया गया था।
- परिणाम: विश्लेषण के अनुसार, इस पुराने समझौते का आज तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है, जिससे नए समझौतों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग गया है।
5.तकनीकी सीमाएँ और बुनियादी ढांचा
- उत्पाद की उपलब्धता: वर्तमान में पुछ एआई के पास कोई समर्पित ऐप या वेब इंटरफेस नहीं है; इसे केवल WhatsApp चैटबॉट के माध्यम से एक्सेस किया जा सकता है।
- तकनीकी प्रमाणों का अभाव: कंपनी ने अपने एआई मॉडल की श्रेष्ठता साबित करने के लिए उद्योग को कोई भी स्वतंत्र बेंचमार्क डेटा प्रदान नहीं किया है।
- अपुष्ट वास्तुकला: इसके कोर मॉडल का आर्किटेक्चर और एल्गोरिदम अनवेरिफाइड (Unverified) और अघोषित हैं। किसी भी स्वतंत्र विश्लेषक ने अभी तक इसके दावों की पुष्टि नहीं की है।
6.ब्रांडिंग और मार्केटिंग रणनीति
- सेलेब्रिटी एंडोर्समेंट: कंपनी तकनीकी श्रेष्ठता के प्रमाण देने के बजाय ‘लाउड ब्रांडिंग’ और सेलिब्रिटी आवाजों का भारी उपयोग कर रही है।
- स्वदेशी एआई का दावा: यह कंपनी “सॉवरेन एआई” (Sovereign AI) बनाने के नाम पर आक्रामक मार्केटिंग कर रही है।
7.वर्तमान स्थिति और विवाद:
- कार्यशील उत्पाद का अभाव: स्रोतों के अनुसार, वर्तमान में Puch AI के पास कोई वर्किंग प्रोडक्ट (working product) मौजूद नहीं है।
- WhatsApp प्रतिबंध: मेटा (Meta) ने अपने प्लेटफॉर्म पर जनरल-पर्पज चैटबॉट्स को बैन कर दिया है, जिसके कारण इनका WhatsApp चैटबॉट जनवरी 2026 से बंद हो चुका है।
- संपर्क में विफलता: दिए गए नंबर पर कॉल या मैसेज करने पर कोई प्रभावी प्रतिक्रिया नहीं मिलती है। मैसेज करने के 15 घंटे बाद भी कोई जवाब नहीं आया।
8.गंभीर आरोप:
- संभावित धोखाधड़ी: इसे एक बड़ा “फ्रॉड” बताया जा रहा है क्योंकि बिना किसी वास्तविक उत्पाद या क्षमता के इतना बड़ा निवेश समझौता (MOU) किया गया।
- भ्रामक जानकारी: कंपनी पर आरोप है कि उन्होंने सरकार को केवल प्रेजेंटेशन (PPT) दिखाकर प्रभावित किया है, जबकि हकीकत में उनके पास तकनीक उपलब्ध नहीं है।
- रेवेन्यू डेटा: इनके राजस्व (revenue) के आंकड़ों को लेकर भी विवाद है, जिस पर कंपनी का दावा है कि वे आंकड़े किसी और कंपनी के हो सकते हैं।
सकारात्मक पक्ष
भाषाई विविधता: इस एआई की एक सकारात्मक विशेषता यह है कि यह 22 भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं (Vernacular Languages) में कंटेंट और एआई क्षमताएं प्रदान करने का प्रयास कर रहा है।
आलोचनात्मक
स्रोतों के अनुसार, यह एमओयू केवल एक “स्टेटमेंट ऑफ इंटेंट” (Statement of Intent) है, न कि पूरी तरह से विकसित सिस्टम। कंपनी पर तकनीकी प्रूफ देने के बजाय मार्केटिंग का सहारा लेने के आरोप लगाए गए हैं।
9.संभावित जोखिम और आरोप
- ‘पंप और डंप’ के आरोप (“Pump and Dump” Allegations)
धोखाधड़ी के आरोपों का एक मुख्य हिस्सा यह है कि यह MoU केवल कंपनी के शेयर की कीमतों में ‘हाइप’ (उछाल) पैदा करने के लिए किया गया है। स्रोतों के अनुसार, यह एक ‘पंप और डंप’ योजना हो सकती है, जहाँ सरकारी अनुबंध की खबर से शेयरों के दाम बढ़ाकर बाद में रिटेल निवेशकों को नुकसान पहुँचाकर मुनाफा कमाया जा सके। और बाद में प्रोजेक्ट के विफल होने पर आम (रिटेल) निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ता है।
- पिछले प्रदर्शन का खराब इतिहास (History of Non-Performance)
स्रोतों ने पहले के ऐसे समझौतों की ओर इशारा किया है जिनका कोई परिणाम नहीं निकला। उदाहरण के लिए, 2023 में ‘अराहास टेक्नोलॉजीज’ (Arahas Technologies) के साथ अयोध्या को “AI-पावर्ड वैदिक सिटी” बनाने का MoU साइन हुआ था, लेकिन अब तक उसका कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है। यह दर्शाता है कि ऐसे समझौते अक्सर वास्तविक विकास के बजाय केवल दिखावे या वित्तीय हेरफेर के लिए किए जाते हैं।
- प्रशासनिक विफलता (Bureaucratic Failure)
विश्लेषण यह भी संकेत देता है कि उत्तर प्रदेश सरकार को उन नौकरशाहों (Bureaucrats) द्वारा गुमराह किया गया हो सकता है जिन्होंने कंपनी की पृष्ठभूमि और तकनीकी क्षमताओं की सही जांच (Due Diligence) नहीं की। स्रोतों का दृढ़ता से सुझाव है कि इतने बड़े वित्तीय प्रतिबद्धता से पहले IIT संस्थानों के विशेषज्ञों से तकनीक की वैधता की पुष्टि करानी चाहिए थी।
निष्कर्ष और सुझाव
स्रोतों में यह परामर्श दिया गया है कि सरकार को इस तरह के बड़े निवेश समझौतों से पहले IIT विशेषज्ञों और AI क्षेत्र के अनुभवी लोगों से सलाह लेनी चाहिए। ‘पूछ AI’ जैसी कंपनियों की साख और उनकी तकनीकी क्षमता की गहन जांच आवश्यक है ताकि सार्वजनिक धन और संसाधनों का सही उपयोग हो सके।
